मुरादाबाद, 03 जून। सीएल गुप्ता आई इंस्टीट्यूट में आयोजित श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के द्वितीय दिवस पर कथा व्यास आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण महाराज ने कहा कि जड़-चेतन सहित समस्त विश्व परमात्मा का ही प्रत्यक्ष स्वरूप है। उन्होंने कहा कि भारतीय ऋषि परंपरा का मूल संदेश सर्वभूतमय ईश्वर भाव है, जिसके माध्यम से मनुष्य भय, शोक, हर्ष और मोह से मुक्त होकर परम कल्याण को प्राप्त कर सकता है।
कथा प्रसंग में आचार्य श्री ने राजा परीक्षित और परमहम्स शुकदेव संवाद का वर्णन करते हुए बताया कि जब राजा परीक्षित को अपने समीप उपस्थित मृत्यु का ज्ञान हुआ तो उन्होंने पूछा कि ऐसे समय में मनुष्य का कर्तव्य क्या होना चाहिए। इस पर शुकदेव जी ने समस्त शास्त्रों का निष्कर्ष बताते हुए कहा कि कल्याण चाहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सर्वतोभावेन भगवान का स्मरण करना चाहिए।
उन्होंने विराट पुरुष के स्वरूप का वर्णन करते हुए बताया कि संपूर्ण ब्रह्मांड भगवान का ही शरीर है। पर्वत उनकी अस्थियाँ, नदियाँ उनकी नाड़ियाँ तथा वृक्ष उनके शरीर के रोम हैं। ब्रह्मा, इंद्र, वरुण आदि के लोकों सहित समस्त भुवन भगवान के ही विराट स्वरूप के अंग हैं। नाम और रूप से युक्त यह संपूर्ण जगत सच्चिदानंद परमात्मा की अभिव्यक्ति है, इसलिए उसके प्रति श्रद्धा और विनम्रता का भाव रखना आवश्यक है।
आचार्य श्री ने भगवान कपिल के अवतार का वर्णन करते हुए सांख्य योग, भक्ति योग तथा अष्टांग योग की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने वराह अवतार की कथा सुनाते हुए बताया कि भगवान ने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी का उद्धार किया। साथ ही स्पष्ट किया कि सुर और असुर दोनों ही ईश्वर की विभूतियाँ हैं। हिरण्याक्ष वास्तव में भगवान का पार्षद था, जो सनकादिक ऋषियों के श्राप से असुर योनि में उत्पन्न हुआ था।
उन्होंने कहा कि धर्म और अधर्म के विवेकपूर्ण आचरण से ही दैवी और आसुरी वृत्तियों का निर्धारण होता है। तत्त्वज्ञ साधक प्रत्येक परिस्थिति में परमात्मा की कृपा का अनुभव करता है। श्रीमद्भागवत मनुष्य को द्वंद्वात्मक दृष्टि से ऊपर उठाकर सर्वत्र ईश्वरीय अनुग्रह का अनुभव कराती है। लोकपितामह ब्रह्मा, महर्षि कश्यप, स्वयंभू मनु तथा संपूर्ण सृष्टि और देशकाल भगवान की लीलामयी अभिव्यक्ति हैं।
कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और उन्होंने भक्तिभाव से कथा श्रवण कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया।












