मुरादाबाद, 4 जून 2026।
सी एल गुप्ता आई इंस्टीट्यूट के सभागार में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण सप्ताह ज्ञानयज्ञ के तृतीय दिवस पर आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण जी महाराज ने भागवत महापुराण के दस लक्षणों में वर्णित मन्वंतर कथाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए कहा कि भारतीय कालगणना और धर्माचरण की परंपरा का प्रमाण मन्वंतर आख्यान हैं। उन्होंने बताया कि चौदह मनुओं के कार्यकाल से भारतीय कालगणना निर्धारित होती है तथा एक मनु से दूसरे मनु के काल परिवर्तन को मन्वंतर कहा जाता है। वर्तमान समय वैवस्वत मन्वंतर है, जो चौदह मनुओं में सातवां मन्वंतर माना गया है।

आचार्य श्री ने कहा कि मन्वंतर कथाओं का उद्देश्य धर्म की स्थापना करते हुए मानव जाति के सतत विकास और जीवन मूल्यों की परंपरा को आगे बढ़ाना है। स्वायंभुव, स्वरोचिष, तामस, चाक्षुष तथा वैवस्वत मनुओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति और धर्मनिष्ठ जीवनशैली के क्रमिक विकास का वर्णन भागवत में प्राप्त होता है।
कथा प्रसंग में उन्होंने मनु की वंश परंपरा का वर्णन करते हुए महाराज उत्तानपाद, भक्त ध्रुव तथा सम्राट प्रियव्रत की वंशावली में भगवान ऋषभदेव के दिव्य चरित्र का वर्णन किया। मनु की तीन पुत्रियों के वंश विस्तार की चर्चा करते हुए अकूति, देवहूति एवं प्रसूति की पुत्री देवी सती के चरित्र का वर्णन किया तथा भगवान विष्णु और भगवान शिव की यज्ञरूपता एवं उनके अभिन्न एकत्व का प्रतिपादन किया।
उन्होंने कहा कि कर्मकांड और अहंकार में उलझे प्रजापति दक्ष ने शिवत्व का अनादर किया, जिसके परिणामस्वरूप उनका यज्ञ भंग हो गया। शिवद्रोह से युक्त उस यज्ञ में आमंत्रित होने के बावजूद भगवान शिव और ब्रह्माजी सम्मिलित नहीं हुए। इस प्रसंग के माध्यम से त्रिदेवों की परस्पर एकता तथा सृष्टि, पालन और संहार की दिव्य लीलाओं का विवेचन किया गया।
भक्तिमूलक सप्ताह कथा के तीसरे दिन आचार्य श्री ने प्रजापतियों के विभिन्न कथानकों के माध्यम से परमात्मा के भौगोलिक एवं प्रजारूपी स्वरूप का निरूपण किया। कथा के समापन पर जड़ भरत के तीन जन्मों का मार्मिक वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि मनुष्य को स्वयं तथा संसार के साथ किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को भक्तिभाव से परिपूर्ण हृदय बनाए रखने और जीवन में वैराग्य, भक्ति तथा आत्मचिंतन को अपनाने की प्रेरणा दी।












