धूप अपने चरम पर थी। आसमान से जैसे आग बरस रही हो। हर कोई छांव की तलाश में था। पर एक नन्ही सी मैना, अपनी चोंच में दाना लिए, बार-बार उड़कर आती — और अपने घोंसले में बैठे भूखे बच्चों को प्यार से खिलाती।
वो न धूप से घबराई, न थकान से टूटी। हर बार जब उसका बच्चा चूं-चूं करता, वो उड़ती, खोजती, लाती — सिर्फ अपने बच्चों के लिए।
उस छोटे से दृश्य में, मां शब्द की परिभाषा बस जाती है।
ममता की यह तस्वीर, हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम त्याग मांगता है।
क्या हमने कभी सोचा है कि हमारी माएं भी ऐसी ही मैना हैं?
वो भी तो बिना कुछ कहे, बिना थके, हमारी हर जरूरत पूरी करती हैं — चाहे जीवन में कितनी भी धूप क्यों न हो।
मैना की तरह ही, हर मां अपने बच्चों के लिए सबसे मुश्किल वक्त में भी मुस्कराती है — सिर्फ इस उम्मीद में कि उसका बच्चा मुस्कराए।














